Wednesday, September 22, 2010

डगमग मेरे कदम...


डरा हुआ है मन, क्योंकि तुम हो नाजुक..मैं अनजान हूँ..
मेरा अंश हो...पर मेरी आँखों से दूर हों...
सहेजती हूँ मैं तुमको,हर क्षण!!
कहती हूँ तुमसे बहुत कुछ... करनी बहुत सी बातें हैं... पर जब तुम साथ होगे तो वो कर लुंगी... मन में प्रश्न बहुत सारे ...पास होगे तो पूछ लुंगी!!!
आना,मैं तुम्हारी ऊँगली पकड़कर दुनिया फिर से देखूंगी... साथ चलूंगी दूर तलक फिर सपने तेरे सहेजुंगी!!

Tuesday, September 21, 2010

मातृत्व...

मैंने खुद को पहचाना... देखा ,परखा और समझा...खुद की कमजोरियों और अपनी ताकत को!
हर बार क्षणों में निर्णय लेने वाली मैं.. घंटों,दिनों और महीनों... समझती और सोचती रही...