
मेरे हृदयांश!
सबको मैंने बताया है... तुम्हारे आने के बारे में..
उन सबको जो तुम्हारे लिए हमेशा शुभकामना ही करेंगे...
जब तुम आओगे, जीवन कैसा होगा ये मैं नहीं सोचना चाहती थी...
पर ज्यों ज्यों इस राह में आगे और तुम्हारे और पास पहुँच रही हूँ...
एक डोर जैसे बाँध रही है..शायद हर भय से बंधनमुक्त भी कर रही है...
जानते हों,कभी मैं बच्ची ही बनी रहना चाहती थी...
नहीं जिम्मेदारियों और गलतियों से मुंह छिपाने के लिए...
या बहुत सारा प्यार पाने के लिए...
पर अब लगता है,प्यार देने में भी बहुत आनंद है!!!
माँ... ये कभी इतना मीठा ना था!!
बच्चे तो हमेशा से प्यारे लगते थे...
पर शिशु को देख मेरी आंखें ऐसी कभी ना भरी थी..
जैसी अब भर जातीं हैं...
मैं बदल रही हूँ..मन से,ह्रदय से,आत्मा से!
तुम्हारे सृजन से मेरा नवसृजन हों रहा है..
तुम मेरे जीवन के सूर्य की आहना हो..
परमेश्वर से तुम्हारी कुशलता के लिए...
उनकी छाया तुम पर बनी रहे...
मेरी उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों में ही..
सदा तुम्हारी ही...
माँ
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